Sunday, March 14, 2021

2021 में भी रेडियो का ऐसा जादू

हमारी पीड़ी के बचपन की प्लानिंग अकसर टीवी पर दिखाई जाने वाली हफ्ते की दो हिंदी फिल्मों और दो चित्रहार प्रोग्रामों के इर्द-गिर्द ही घूम लिया करती थी ...उसे कहीं भी आवारा घूमने की फ़ुर्सत ही न मिलती थी...जिस दिन शाम को या रात को टीवी पर फिल्म दिखाने का दिन होता, हमारी सारी प्लॉनिंग सुबह ही से शुरू हो जाती ...स्कूल में भी यही रोमांच बराबर बना रहता है कि सह ले, बेटा, चौहान मास्टर ने कान मरोड़ भी दिए हैं तो ग़म न कर, अंग्रेज़ी वाले सुरिंदर शर्मा सर ने अपनी आस्तीन ऊपर चढ़ा कर एक ज़ोरदार तमाचा लगा ही दिया है तो परवाह नहीं .....यह ग़म की दोपहर तो बीतने वाली है, शाम तो अपनी है, मस्ती से टीवी के सामने बैठ कर फिल्म देखेंगे ...पत्थर के सनम!!

ये बातें तो हुईं 45-50 साल पुरानी लेकिन अगर आज के दिन भी मेरे जैसे किसी बंदे को रेडियो की इतनी ज़्यादा लत हो कि वह रेडियो के प्रोग्रामों का इंतज़ार करता रहे...विशेषकर रविवार के दिन दोपहर 2 बजने का इंतज़ार करता रहे क्योंकि बाईस्कोप की बातें सुनाई जाने वाली हैं...तो इसे कोई भी कहेगा कि यहां तो उम्र पचपन से भी बढ़ गई लेकिन दिल अभी भी बचपन वाला ही जान पड़ रहा है। 

वैसे तो एप भी है अब विविध भारती की - आते जाते कहीं भी सुन सकते हैं लेकिन उस एप के ज़रिए रेडियो कार्यक्रम सुनने में और अपने कमरे में इत्मीनान से लेट कर किसी प्रोग्राम को सुनने में वही फ़र्क है जो आज से तीस-चालीस बरस पहले थियेटर में जा कर फिल्म देखने में और आज दुनिया भर की फिल्में अपने मोबाइल पर देखने में फ़र्क है ...ज़ाहिर सी बात है ज़मीं-आसमां का फ़र्क तो है ही ....

मुझे कल अहसास हुआ कि मुझे रेडियो की लत कितनी बुरी तरह लग चुकी है जब दोपहर दो और तीन बजे के दौरान मेरे साथ ही बैठे बेटे ने एक बार कुछ बात की ...पता नहीं मैंने कैसे जवाब दिया या नहीं दिया...पांच मिनट बाद श्रीमति ने कुछ पूछा तो बेटे न झट से कह दिया - अभी गाना आएगा तो बात करते हैं। जी हां, जैसे पुराने दौर में टीवी पर फिल्म देखते देखते बीच में इश्तिहार आते थे ...इस प्रोग्राम में कुछ कुछ अंतराल के बाद बहुत उम्दा फिल्मी गीत बजते हैं।लेकिन कभी कभी ऐसा भी होता है कि अगर कोई कार्यक्रम देखते हुए या किताब पढते हुए हमें ज़्यादा ही सुकून हासिल होेने लगे तो हमें नींद आ जाती है ...मेरे साथ ऐसा बहुत बार हुआ है ...कल भी ऐसा ही हुआ ...बाईस्कोप की बातें सुनते सुनते कब 5-10 मिनट के लिए झपकी आ गई, पता ही नहीं चला। खैर, जब फिर से उठा तो थोड़ा सा मलाल तो हुआ जैसे कुछ तो छूट गया ...लेकिन कोई बात नहीं, इत्मीनान से पूरा प्रोग्राम 3 बजे तक सुना....अभी गल्ती से लिख दिया "देखा".... लेकिन टीवी देखने का तो कोई स्कोप ही नहीं है, याद भी नहीं ठीक से कितना अरसा हो गया टीवी देखे हुए...घर के सभी एलएसडी बिना किसी केबल कनेक्शन के धूल चाट रहे हैं। 

चलिए, जिस प्रोग्राम की मैं बात कर रहा हूं उस के बारे में कुछ गुफ्तगू करते हैं ...यह प्रोग्राम है बाइस्कोप की बातें ... विविध भारती के फेसबुक पेज पर जो इस का विज्ञापन आता है उस की फोटो यहां लगा रहा हूं....


मुझे अच्छे से याद है जब साठ-सत्तर के दशक में मैं स्कूल में पढ़ता था तो उन दिनों रेडियो में रविवार के दिन दोपहर में किसी हिंदी फिल्म की स्टोरी सुनाई जाती थी ...हम लोग उसे भी बड़े चाव से सुना करते थे ..अच्छा, अभी याद आया कि पहले सुनने वाले प्रोग्राम भी हमारा मनोरंजन खूब किया करते थे ...मुझे याद है 1975 के दिन ...अभी शोले रिलीज़ ही हुई थी ...मेरी बुआ की बेटी -रीटा दीदी सेल से चलने वाले अपने पेनोसॉनिक टेपरिकार्ड पर अकसर शोले फिल्म के डायलाग और गीत सुना करती (पहले ये टेप मिल जाती थीं)  ...सुनते सुनते मुस्कुराया करती और हम अगर कोई बात करना भी चाहते तो चुप रह कर शांति से प्रोग्राम सुनने को कह देतीं। मुझे लगता है हमें यह रेडियो सुनने की, टेपरिकार्डर बजाने का खानदानी मर्ज है ...मेरा बड़ा भाई जो मुझ से 8 साल बड़ा है, वह भी विविध भारती का ऐसा दीवाना है कि अकसर सो जाता है और विविध भारती उस के पास पड़े ट्रांजिस्टर पर बजता ही रहता है...और मेरे साथ भी तो ऐसा ही होता है कईं बार...

बहुत बड़ी स्टेटमैंट दे रहा हूं ....लेकिन मन में आई बात को अंदर दबाना हम सीखे नहीं और इस के लिए कितने कष्ट भी सहे हैं ज़िंदगी में ..परवाह नहीं ... हां, तो मैं यह सोचता तो बहुत बार हूं लेकिन आज दिखने की हिम्मत पहली बार जुटा रहा हूं कि विविध भारती की आवाज़ हमें कहीं मां की मीठी लोरी जैसी तो नहीं लगती .....अब इस के आगे मैं क्या कहूं, कुछ भी कहने को रह ही नहीं जाता। 

रेडियो सुनने का हमारे यहां मतलब है विविध भारती सुनना ...और किसी भी फ्रिक्वेंसी से हमें कोई सरोकार नहीं ...न ही शायद होगा ...हमारा बेटा भी एक मशहूर रेडियो स्टेशन पर दो-तीन साल रेडियो जॉकी रहा ... शाम के वक्त तीन घंटे का उस का लाइव प्रोग्राम आया करता था, लेकिन शायद ही कभी पूरा हमने सुना हो ...वही घर की मुर्गी वाली बात और  शायद वह भी कि घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध। 

बेटा कहता है कि बापू, तुम्हें भी न मनमोहन देसाई, बी आर, यशराज की फिल्मों ने बड़ा फिल्मी बना दिया है .. और बड़ा हंसता है यह कह कर ...मैंने स्कूल कालेज के दौर में बहुत फिल्में देखी हैं....हिंदी और पंजाबी फि्ल्में ...इसलिए अगर किसी पुरानी फिल्म के बारे में पता चलता है जिसे नहीं देखा तो मुझे बड़ी हैरत होती है ...कल दोपहर में भी तो यही हुआ ...जनाब लोकेन्द्र शर्मा जी की अद्भुत आवाज़ में बाइस्कोप की बातों में बी आर चोपड़ा की फिल्म आदमी और इंसान की बातें हम तक पहुंच रही थीं...और मैं निरंतर यही सोचता रहा कि इतनी उम्दा फिल्म कैसे मिस हो गई। प्रोग्राम सुनते हुए मैं बेटे को कह रहा था कि इस फिल्म के ये सब सुपरहिद गीत मैं बचपन में रेडियो पर सुना करता था ..इसलिए 1967 या 1968 की ही होगी यह फिल्म - और फिर नेट पर देखा कि यह 1969 की है यह फिल्म.... बचपन की यादें भी बेमिसाल और लाजवाब होती हैं, हैं कि नहीं?

प्रोग्राम के बाद मोबाइल में तुरंत फिल्म को अपने मोबाइल पर डाउनलोड तो कर लिया लेकिन देखने की इच्छा नहीं हुई ...कम से कम लैपटाप पर या किसी बड़ी स्क्रीन पर ही देखेंगे जल्द ही ...

चलिए, अभी इन बातों को बंद करते हैं लेकिन आप को बस इतना बताना है कि अगर कल रविवार को आप यह प्रोग्राम नहीं भी सुन पाएं तो आज सोमवार अभी 10 बजे सुबह विविध भारती पर इसे फिर से सुन सकते हैं...

Wednesday, February 24, 2021

फिल्मी गीतों का जादू ...

कुछ दिन पहले मैं कर्जत में था...ऐसे ही बिना किसी ख़ास वजह के ही कर्जत देखने की इच्छा हुई, सो हो गया कर्जत के लिए रवाना... स्टेशन के बाहर एक दुकान पर कपड़े का थैला खरीदने के लिए रुका...उस के मालिक जो एक मुस्लिम बुज़ुर्ग थे ..75-80 बरस के तो होंगे ही ... उन की दुकान में बहुत बढ़िया फिल्मी गीत बज रहे थे ...शाम का वक्त था ...अच्छा माहौल था ..मैंने ऐसे ही पूछ लिया ...पुराने दौर के बहुत उम्दा गीत सुन रहे हैं, एफ.एम लगा है क्या! उन्होंने बताया - नहीं, चिप लगा रखा है। 

अच्छा लगा उन की बात सुन कर ... मैं अकसर सोचता हूं कि हमारे पास भी अब तो फिल्मी गीत सुनने के कितने जुगाड़ हो गए... आज से 50 साल पहले की बातें याद करता हूं तो याद आता है कि फिल्मी गीतों से हमारे तालुक्क रेडियो के ज़रिए ही हुआ करता था ..सुबह शाम कुछ वक्त के लिए हिंदी फिल्मी गीत बजा करते थे ...इंतज़ार रहता था ... दूसरी-तीसरी कक्षा के दिनों की बातें हैं...हमारे पास मर्फी का एक रेडियो था ...जिस की सालाना 2-3 रूपये लाइसेंस फीस डाकखाने में जमा करना पड़ती थी ...और एरियर की लंबी तार को ऊपर छत पर जा कर किसी ईंट के नीचे रखना पड़ता था ... रेडियो का स्विच ऑन करने पर उसे गर्म होने के लिए समय लगता था .. उस के बाद भी भरोसा नहीं सिग्नल मिलेगा कि नहीं, और अगर सिग्नल मिलेगा भी तो कितना स्ट्रांग ... मेरे कहने का आशय है कि बड़ी मुश्किल से ही किसी गीत के पूरे बोल सुन पाते थे ... 

बहरहाल, ज़िंदगी कट रही थी, सुकून बहुत था .. लेकिन आज से 50-52 साल पहले का दौर वह था जब रेडियो सुनना भी एक ऐब जैसा माना जाता था ...मुझे धुंधला धुंधला याद है कि घर में कोई पढ़ रहा हो तो रेडियो लगाने का तो सवाल ही नहीं उठता था, किसी के इम्तिहान चल रहे हैं तो भी, किसी की आठवीं-दसवीं या प्री-मैडीकल की पढ़ाई है तो भी बहुत संकोच के साथ ही रेडियो चलाया जाता था ..कोई न कोई टोक ही देता था ...पढ़ ले, कुछ दिनों की बात है, उस के बाद इसे ही सुनना है, कहीं भागा नहीं जा रहा। मुझे अभी भी याद है मैं 7-8 बरस का रहा हूंगा और मेरा बड़ा भाई दसवीं में ...उसे रेडियो सुनना बहुत भाता था ...जितनी मशक्कत मैंने उसे रेडियो के साथ करते देखा ...कभी उस के बटनों को घुमाते, कभी रेडियो की बॉडी को थपथपाते ....कभी सिग्नल मिल जाता तो कोई टोक देता ...कोई झिड़क देता ... और रेडियो सुनने के अरमान दिल में ही दबे रह जाते ... और हां, बिजली जाने का, ब्लैक-आउट होने का लफड़ा, वो अलग ... क्योंकि ये सभी रेडियो बिजली ही से चलते थे। सारी बात का सार यही समझिए कि रेडियो पर अमीन सयानी द्वारा प्रस्तुत सिबाका गीत माला का पूरा लुत्फ़ उठाने के लिए मुकद्दर का सिकंदर होना ज़रूरी था...

रेडियों से जुड़ी यादें मैने अपने इस ब्लॉग पर और रेडियोनामा ब्लॉग पर संजो कर रखी हैं... इस ब्लाग पर आज 11 महीने के बाद लिख रहा हूं ..ऐसे ही ख़्याल आ रहा कि हमारे लोगों के पास जितने ज़्यादा साधन हो गए हैं मनोरंजन के ...उतनी ही उन की वेल्यू ख़त्म सी हो गई है...मैंने ऊपर लिखा है कि फिल्मी गीत सुनने के लिए रेडियो का और उन्हें देखने के लिए 1975 के आसपास के दिनों में दूरदर्शन ही एक सहारा हुआ करता था ... अब तो हर तरफ़ मनोरंजन ही मनोरंजन है, है कि नहीं?- दर्जनों तरह के उपकरण आ गये हैं ये सब देखने-सुनने के लिए ...इस फेहरिस्त में सब से ऊपर तो है मोबाइल ....साथ में लगा लिए एयर-फोन तो बस हो गया काम। देखते ही देखते सारे-गामा जैसे उपकरण आ गए जिसमें हज़ारों गीत स्टोर हैं, अपनी पसंद के मुताबिक सुन लीजिए....

सुविधाएं जितनी भी बढ़ गई हों, लेकिन मुझे हमेशा ही से और आज भी रेडियो पर ही फिल्मी गीतों के प्रोग्राम सुनना भाता है ...कभी कभी मुझे विविध भारती अपने मोबाइल पर सुनना पड़ता है ...लेकिन हमारे यहां हर कमरे में बिजली या सेल से चलने वाला ट्रांजिस्टर या रेडियो है ...और एंटीक रेडियो सेट्स की एक अच्छी कलेक्शन कर रखी है ...कारण वही एक कि हमें रेडियो से बेइंतहा मुहब्बत है ...और सुनते भी हम विविध भारती ही हैं...जितने भी गेजेट्स आ जाएं, जितने भी एप्स आ जाएं...लेकिन बिजली वाले रेडियो से फिल्मी गीत सुनने का मज़ा ही अलग है ...यह भी एक ऐसी चीज़ है ...जिस की तरफ़ देखते ही पुराने दिन यकायक आंखों के सामने आ जाते हैं....पिता जी का ख़बरों के प्रति लगाव, पड़ोस वाले नानक सिंह अंकल का ट्रांजिस्टर कंधे पर रख कर आंगन में तब तक चक्कर लगाते रहना जब तक बंगला देश के आज़ाद होने की ख़बर बीबीसी से साफ़ सुनाई न देने लगे ...उन दिनों जिस का रेडियो बीबीसी पकड़ लेता था ...वह भी उस दौर का एक स्टेट्स सिम्बल ही होता था... और अभी अपने बुज़ुर्ग नाना जी का ख़्याल आ गया...80 की उम्र में भी आठवीं -दसवीं कक्षा को मैथ-इंगलिश पढ़ा कर आत्म-सम्मान से रहते थे ... जब रात में बच्चे पढ़ कर चले जाते तो वे बड़ी कोशिश करते कि बिजली वाला रेडियो चल पड़े ...उन की मशक्कत देखते मैं भी मन ही मन प्रार्थना करता कि काश, यह चल जाए और नाना जी का मन बहल जाए ....लेकिन मुझे नहीं याद कि कभी उस ने नाना जी का दिल बहलाया हो...

आज इतने लंबे अरसे बाद यह लिखना का ख़्याल इसलिए भी आ गया कि आज महान गीतकार आनंद बक्शी साहब के बेटे ने एक सीरीज़ शुरु की है ...बक्शी साहब के फैन्स की इंटरव्यू ... और मुझे उन्होंने आज कहा है कि किसी दिन तुम्हारा इंटरव्यू भी करना है ...सोच रहा हूं आनंद बक्शी साहब के बारे में मैं क्या कहूंगा ... जो काम वो कर गए, उस की महानता ब्यां करने के लिए अल्फ़ाज़ कहां से लाएगा मेरे जैसा अनाड़ी ... 

मेरे ख़्याल में आज यहीं पर फुल-स्टाप लगाते हैं ....नींद आने लगी है, एक गीत लगा देता हूं ...यह उन तीन चार गीतों में से एक है जिस के साथ मुझे छुटपन की कुछ यादें बाबस्ता हैं ... शायद यह गीत मैं तब से सुन रहा हूं जब मैं पांच बरस का था ... यह है फिल्मी गीतों का जादू....पचास साल से हज़ारों बार न भी सही, सैंकड़ों बार तो वही गीत सुन कर लुत्फ़अंदोज़ होते हैं लेकिन फिर भी, दिल है कि मानता नहीं, अभी भी सुनते ही रहते हैं अकसर!! 

प्रवीण चोपड़ा

25.2.21